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13 जनवरी 2019

उत्तरायण के दिन पितामह भीष्म ने प्राण त्याग दिए Mahabharat


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58 दिन बाणों की शैया पर बिताने के बाद मकर संक्राति को भीष्म पितामह ने त्यागे थे प्राण, इच्छा मृत्यु का वरदान था प्राप्त

महर्षि वेदव्यास की महान रचना महाभारत ग्रंथ के प्रमुख पात्र भीष्म पितामह हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि वे एकमात्र ऐसे पात्र है जो महाभारत में शुरूआत से अंत तक बने रहे। 18 दिनों तक चले महाभारत के युद्ध में 10 दिन तक लगातार भीष्म पितामह लड़े थे। पितामह भीष्म के युद्ध कौशल से व्याकुल पाण्डवों को स्वयं पितामह ने अपनी मृत्यु का उपाय बताया। भीष्म पितामह 58 दिनों तक बाणों की शैया पर रहे लेकिन अपना शरीर नहीं त्यागा क्योंकि वे चाहते थे कि जिस दिन सूर्य उत्तरायण होगा तभी वे अपने प्राणों का त्याग करेंगे।
कुछ विद्वान मानते हैं कि देवव्रत (भीष्म) को महाभारत का खलनायक माना जाना चाहिए। भीष्म ने अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका की भावनाओं को कुचलकर जो कार्य किया वह अमानवीय था। भीष्म ने ऐसे कई अपराध किए, जो किसी भी तरह से धर्म द्वारा उचित नहीं थे इसलिए कहा जाता है कि वे अधर्म के साथ होने के कारण आदर्श चरित्र नहीं हो सकते। भीष्म अपने पिछले जन्म में एक वसु थे और एक शाप के चलते उन्हें इस जन्म में मनुष्य बनकर कष्ट झेलना थे।
अपने वंश के नाश से दुखी पाण्डव अपने समस्त बन्धु-बान्धवों तथा भगवान श्रीकृष्ण को साथ ले कर कुरुक्षेत्र में भीष्म पितामह के पास गये। भीष्म जी शरशैया पर पड़े हुये अपने अन्त समय की प्रतीक्षा कर रहे थे। भरतवंश शिरोमणि भीष्म जी के दर्शन के लिये उस समय नारद, धौम्य, पर्वतमुनि, वेदव्यास, वृहदस्व, भारद्वाज, वशिष्ठ, त्रित, इन्द्रमद, परशुराम, गृत्समद, असित, गौतम, अत्रि, सुदर्शन, काक्षीवान्, विश्वामित्र, शुकदेव, कश्यप, अंगिरा आदि सभी ब्रह्मर्षि, देवर्षि तथा राजर्षि अपने शिष्यों के साथ उपस्थित हुये। भीष्म पितामह ने भी उन सभी ब्रह्मर्षियों, देवर्षियों तथा राजर्षियों का धर्म, देश व काल के अनुसार यथेष्ठ सम्मान किया।

सारे पाण्डव विनम्र भाव से भीष्म पितामह के पास जाकर बैठे। उन्हें देख कर भीष्म के नेत्रों से प्रेमाश्रु छलक उठे। उन्होंने कहा, "हे धर्मावतारों! अत्यन्त दुःख का विषय है कि आप लोगों को धर्म का आश्रय लेते हुये और भगवान श्रीकृष्ण की शरण में रहते हुये भी महान कष्ट सहने पड़े। बचपन में ही आपके पिता स्वर्गवासी हो गये, रानी कुन्ती ने बड़े कष्टों से आप लोगों को पाला। युवा होने पर दुर्योधन ने महान कष्ट दिया। परन्तु ये सारी घटनायें इन्हीं भगवान श्रीकृष्ण, जो अपने भक्तों को कष्ट में डाल कर उन्हें अपनी भक्ति देते हैं, की लीलाओं के कारण से ही हुये। जहाँ पर धर्मराज युधिष्ठिर, पवन पुत्र भीमसेन, गाण्डीवधारी अर्जुन और रक्षक के रूप में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण हों फिर वहाँ विपत्तियाँ कैसे आ सकती हैं? किन्तु इन भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं को बड़े बड़े ब्रह्मज्ञानी भी नहीं जान सकते। विश्व की सम्पूर्ण घटनायें ईश्वाराधीन हैं! अतः शोक और वेदना को त्याग कर निरीह प्रजा का पालन करो और सदा भगवान श्रीकृष्ण की शरण में रहो।

ये श्रीकृष्णचन्द्र सर्वशक्तिमान साक्षात् ईश्वर हैं, अपनी माया से हम सब को मोहित करके यदुवंश में अवतीर्ण हुये हैं। इस गूढ़ तत्व को भगवान शंकर, देवर्षि नारद और भगवान कपिल ही जानते हैं। तुम लोग तो इन्हें मामा का पुत्र, अपना भाई और हितू ही मानते हो। तुमने इन्हें प्रेमपाश में बाँध कर अपना दूत, मन्त्री और यहाँ तक कि सारथी बना लिया है। इनसे अपने अतिथियों के चरण भी धुलवाये हैं। हे धर्मराज! ये समदर्शी होने पर भी अपने भक्तों पर विशेष कृपा करते हैं तभी यह मेरे अन्त समय में मुझे दर्शन देने कि लिये यहाँ पधारे हैं। जो भक्तजन भक्तिभाव से इनका स्मरण, कीर्तन करते हुये शरीर त्याग करते हैं, वे सम्पूर्ण कर्म बन्धनों से मुक्त हो जाते हैं। मेरी यही कामना है कि इन्हीं के दर्शन करते हुये मैं अपना शरीर त्याग कर दूँ।

धर्मराज युधिष्ठिर ने शरशैया पर पड़े हुये भीष्म जी से सम्पूर्ण ब्रह्मर्षियों तथा देवर्षियों के सम्मुख धर्म के विषय में अनेक प्रश्न पूछे। तत्वज्ञानी एवं धर्मेवेत्ता भीष्म जी ने वर्णाश्रम, राग-वैराग्य, निवृति-प्रवृति आदि के सम्बंध में अनेक रहस्यमय भेद समझाये तथा दानधर्म, राजधर्म, मोक्षधर्म, स्त्रीधर्म, भगवत्धर्म, द्विविध धर्म आदि के विषय में विस्तार से चर्चा की। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति के साधनों का भी उत्तम विधि से वर्णन किया।

उसी काल में उत्तरायण सूर्य आ गये। अपनी मृत्यु का उत्तम समय जान कर भीष्म जी ने अपनी वाणी को संयम में कर के मन को सम्पूर्ण रागादि से हटा कर सच्चिदान्द भगवान श्रीकृष्ण में लगा दिया। भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें अपना चतुर्भुज रूप धारण कर के दर्शन दिये। भीष्म जी ने श्रीकृष्ण की मोहिनी छवि पर अपने नेत्र एकटक लगा दिये और अपनी इन्द्रियों को रो कर भगवान की इस प्रकार स्तुति करने लगे - "मै अपने इस शुद्ध मन को देवकीनन्दन भगवान श्रीकृष्णचन्द्र के चरणों में अर्पण करता हूँ। जो भगवान अकर्मा होते हुये भी अपनी लीला विलास के लिये योगमाया द्वारा इस संसार की श्रृष्टि रच कर लीला करते हैं, जिनका श्यामवर्ण है, जिनका तेज करोड़ों सूर्यों के समान है, जो पीताम्बरधारी हैं तथा चारों भुजाओं में शंख, चक्र, गदा, पद्म कण्ठ में कौस्तुभ मणि और वक्षस्थल पर वनमाला धारण किये हुये हैं, ऐसे भगवान श्रीकृष्णचन्द्र के चरणों में मेरा मन समर्पित हो।


इस तरह से भीष्म पितामह ने मन, वचन एवं कर्म से भगवान के आत्मरूप का ध्यान किया और उसी में अपने आप को लीन कर दिया। देवताओं ने आकाश से पुष्पवर्षा की और दुंदुभी बजाये। युधिष्ठिर ने उनके शव की अन्त्येष्टि क्रिया की।

9 दिसंबर 2018

जानिए क्या रिश्ता है पूतना-वध और मां के प्रेम में?

भगवान कृष्ण भारतीय पुराणों के ऐसे नायक हैं, जिनकी कथाओं और लीलाओं में जीवन का हर रस रचा बसा है। यही वजह है कि कृष्ण जन नायक कहे जाते हैं, उनसे जुड़ी हर कथा मनमोहक है। इनमें शिशु कृष्ण द्वारा राक्षसी पूतना के वध की कथा से शायद ही कोई अपरिचित हो।

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जानिए क्या रिश्ता है पूतना-वध और मां के प्रेम में?

सभी जानते हैं कि पूतना, मथुरा नरेश कंस के कहनेे पर कृष्ण का वध करने आई थी, पर इस कथा का एक ऐतिहासिक रहस्य भी है, जिससे कम ही लोग परिचित हैं। कहा जाता है कि कृष्ण का जन्म सतयुग और त्रेतायुग में किए गए कई संकल्पों, वरदानों और अभिशापों को सत्यापित करने के लिए हुआ था। पौराणिक कथाओं के अनुसार श्री कृष्ण, भगवान विष्णु का अवतार हैं। इसी संदर्भ में भगवान विष्णु के वामन अवतार की एक कथा आकर जुड़ती है।




दोनों कथाओं का आपस में क्या संबंध है, कैसे ये आपस में जुड़ती हैं, आइए देखते हैं-




बात उस समय की है जब असुर राज बलि का पराक्रम, वैभव और ऐश्वर्य संसार में सबसे प्रचंड था। पृथ्वी और पाताल के अलावा स्वर्ग पर भी उसी का अधिकार था। जन्म से असुर होते हुए भी राजा बलि में हर दैवीय गुण था, यही कारण था कि देवता उससे पार पाने में असमर्थ हो गए थे। ऐसे समय में असुरों के सामर्थ्य को क्षीण करने के लिए भगवान विष्णु ने धरती पर वामन अवतार लिया।



जानिए क्या रिश्ता है पूतना-वध और मां के प्रेम में?
राजा बलि के दान कर्म का कोेई अंत नहीं था। कहा जाता था कि उसने अपने जीवन में किसी भी याचक को खाली हाथ नहीं लौटाया। इसी क्रम में एक बार बलि ने महान यज्ञ का आयोजन किया। यज्ञ के समापन पर एक बार पुनः उसने दान मांगने के लिए समस्त मनुष्य जाति को आमंत्रित किया। जब बलि याचकों को इच्छित दान सामग्री वितरित कर रहे थे, तब उनकी बहन उनके पास ही सहायता के लिए खड़ी थी।




बहन के तो प्राण ही अपने भाई में बसते थे




बलि को अपनी यह बहन अतिप्रिय थी और बहन के तो प्राण ही अपने भाई में बसते थे। दानकर्म में सुबह से शाम हो गई और सारे याचक संतुष्ट होकर जा चुके थे। ऐसे में अचानक एक छोटे से ब्राह्मण ने राजा बलि की यज्ञशाला में प्रवेश किया और पूछा कि क्या वह भी अपना इच्छित वर पा सकता है?




वह ब्राह्मण बालक इतना सौम्य, सुंदर और मासूम था कि यज्ञशाला में उपस्थित सभी जन उस पर मोहित हो गए और उनमें ममत्व जाग उठा। इसी क्रम में ममता से भरी बलि की बहन के मन में विचार उत्पन्न हुआ कि अगर यह उसका बालक होता, तो उसे जी भर के दुग्धपान कराती और ममता का आनंद लेती। वामन अवतार में आए विष्णु जी ने उसके मन का भाव जान लिया और तथास्तु कह दिया।

इच्छित वर मांगने को कहा




राजा बलि भी बालक की सरल, मनमोहक छवि पर मोहित हो उठे और उसे प्यार से बुलाकर इच्छित वर मांगने को कहा। ब्राह्मण ने उनसे अपने तीन पग बराबर भूमि दान में पाने की इच्छा व्यक्त की। अपने ऐश्वर्य के अहंकार में डूबे राजा बलि ब्राह्मण की इच्छा सुन हंस पड़े और बोले, ब्राह्मण देवता, आप अपनी इच्छानुसार जहां चाहें, वहां की भूमि नाप लें। वह भूमि मैं आपको दान में देने का संकल्प लेता हूं।




राजा बलि के इतना कहते ही वामन ब्राह्मण का आकार बढ़ने लगा और पल भर में उसने एक पग में स्वर्ग और दूसरे पग में पृथ्वी एवं पाताल नाप लिए। इसके बाद उसने बलि से पूछा कि मैं तीसरा पग कहां रखूं? राजा बलि तुरंत ही समझ गए कि स्वयं जगन्नाथ पधारे हैं।
उन्होंने वामन के चरणों में सिर झुकाकर कहा कि तीसरा पग मेरे सर पर रख लीजिए प्रभु। इस तरह राजा बलि स्वयं भगवान की शरण में आ गए और मोक्ष पा गए, लेकिन यह घटना देख रही बहन अपने भाई का ऐसा अपमान सहन ना कर सकी। तुरंत ही उसके मन में आया कि अगर यह मेरा शिशु होता तो इसे अपने ही दूध में विष दे देती। भगवान विष्णु ने उसके मन का यह भाव भी पढ़ लिया और एक बार फिर तथास्तु कह दिया।



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मरण के बंधन से मुक्त




युग परिवर्तन के साथ अपने कुभावों के परिणामस्वरूप बलि की बहन ने राक्षसी पूतना के रूप में जन्म लिया। अपनी इच्छा के अनुरूप उसे भगवान कृष्ण को दुग्धपान कराने और दूध में विष दे देने का अवसर मिला। इस तरह विष्णु भगवान के दोनों वरदान कृष्णावतार में फलीभूत हुए और स्वयं भगवान के हाथों मोक्ष पाकर राक्षसी पूतना जन्म मरण के बंधन से मुक्त हो गई।

7 दिसंबर 2018

बलराम जी का जन्म



बलराम का जन्म यदूकुल के चंद्रवंश में हुआ। कंस ने अपनी प्रिय बहन देवकी का विवाह यदुवंशी वसुदेव से विधिपुर्वक कराया।
जब कंस अपनी बहन को रथ में बिठा कर वसुदेव के घर ले जा रहा था तभी आकाशवाणी हुई और उसे पता चला कि उसकी बहन का आठवाँ संतान ही उसे मारेगा।

कंस ने अपनी बहन को कारागार (Lockup) में बंद कर दिया और क्रमश: 6 पुत्रों को मार दिया, 7वें पुत्र के रूप में नाग के अवतार बलराम जी थे जिसे श्री हरि ने योगमाया से रोहिणी के गर्भ में स्थापित कर दिया।

आठवें गर्भ में कृष्ण थे।

श्री कृष्ण की कहानि 

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इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के भाई बलराम जी का जन्म हुआ था। बलरामजी का प्रमुख शस्त्र हल और मूसल है। इसलिए उन्हें हलधर कहते हैं। उन्हीं के नाम पर इस पर्व का नाम हल-षष्ठी पड़ा। क्योंकि इस दिन हल के पूजन का विशेष महत्व है। इस वर्ष 16 अगस्त को हलछठ है।

कंस ने देवकी के 6 पुत्रों का वध किया था.

वे असल में पूर्व जन्म में उसी की छ: संतानें थे. श्री हरिवंश पुराण के अनुसार कंस के पूर्व जन्म यानि कालनेमि के छ्ह पुत्र थे. जिन्होंने ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए उपासना शुरू की.
उस समय हिरण्यक्षिपु का राज्य था और वह स्वयं को भगवान मानता था. इसलिए उसे उनकी यह उपासना रास नहीं आई.
हिरण्यक्षिपु ने उन 6 पुत्रों को श्रॉप दिया कि ​जिस पिता ने तुम को पाल-पोस के बड़ा किया है, वही गर्भ में स्थित होने पर तुम सबका वध करेगा. जब तुम लोग देवकी के गर्भ में जाओगे तब कालनेमि कंस के रूप में तुम्हारा वध कर देगा.

देवकी के 6 पुत्रों की हत्या के बाद उसके 7वें गर्भ में श्रीशेष (अनंत) ने प्रवेश किया था. भगवान विष्णु ने श्रीशेष को बचाने के लिए योगमाया से देवकी का गर्भ ब्रजनिवासिनी वसुदेव की पत्नी रोहिणी के उदर में रखवा दिया. 8वें बेटे की बारी में श्रीहरि ने स्वयं देवकी के उदर से पूर्णावतार लिया.

श्री कृष्ण की कहानि 

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by ramanan dsagar



वसुदेव ने अपने आठवें पुत्र को आपने चचेरे भाई ब्रज में वसुदेव के पास पहुंचा दिया और इस तरह श्री कृष्ण नंदलाल कहलाए. कृष्ण का जन्म और कंस के वध बाकी कथाएं जग में प्रचलित हैं. पर हम केवल कंस के चरित्र की बात कर रहे हैं.श्रीकृष्ण के भाई बलराम का जन्म

इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के भाई बलराम जी का जन्म हुआ था। बलरामजी का प्रमुख शस्त्र हल और मूसल है। इसलिए उन्हें हलधर कहते हैं। उन्हीं के नाम पर इस पर्व का नाम हल-षष्ठी पड़ा। क्योंकि इस दिन हल के पूजन का विशेष महत्व है। इस वर्ष 16 अगस्त को हलछठ है।

देश के पूर्वी अंचल में इसे ललई छठ भी कहते हैं। इस व्रत को पुत्रवती स्त्रियां करतीं हैं। इस दिन हल द्वार जुता हुआ फल और अन्न ही खाया जाता है। इस दिन गाय का दूध-दही भी नहीं खाया जाता है। इस दिन भैंस का दूध-दही ही उपयोग में लाया जाता है। इस दिन स्त्रियां एक महुए की दातुन करतीं हैं।

बलभद्र या बलराम श्री कृष्ण के सौतेले बड़े भाई थे जो रोहिणी के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। बलराम, हलधर, हलायुध, संकर्षण आदि इनके अनेक नाम हैं। बलभद्र के सगे सात भाई और एक बहन सुभद्रा थी जिन्हें चित्रा भी कहते हैं। इनका ब्याह रेवत की कन्या रेवती से हुआ था। कहते हैं, रेवती 21 हाथ लंबी थीं और बलभद्र जी ने अपने हल से खींचकर इन्हें छोटी किया था।

इन्हें नागराज अनंत का अंश कहा जाता है और इनके पराक्रम की अनेक कथाएँ पुराणों में वर्णित हैं। ये गदायुद्ध में विशेष प्रवीण थे। दुर्योधन इनका ही शिष्य था। इसी से कई बार इन्होंने जरासंध को पराजित किया था। श्रीकृष्ण के पुत्र शांब जब दुर्योधन की कन्या लक्ष्मणा का हरण करते समय कौरव सेना द्वारा बंदी कर लिए गए तो बलभद्र ने ही उन्हें दुड़ाया था। स्यमंतक मणि लाने के समय भी ये श्रीकृष्ण के साथ गए थे। मृत्यु के समय इनके मुँह से एक बड़ा साँप निकला और प्रभास के समुद्र में प्रवेश कर गया था।
व्रत की कथा कहते हैं बहुत समय पहले एक गर्भवती ग्वालिन के प्रसव का समय समीप आया। उसे प्रसव पीड़ा होने लगी। उसका दही भी बेचने के लिए रखा हुआ था। ऐसे में वह मटकी लेकर निकल पड़ी। चलते हुए वह एक खेत में पहुंची जहां और उसने एक पुत्र को जन्म दिया। उसने लड़के कपड़े में लपेटकर वहीं रख दिया और मटकियां उठाकर उठा कर आगे बढ़ गई। उस दिन हरछठ थी। उसका दूध गाय-भैंस का मिला हुआ था पर उसने अपने ग्राहकों को बताया कि दूध भेंस का ही है।
वह तुरंत वापस गई और ग्वालिन ने जिसको भी दूध बेचा था उन्हें सच बता दिया। इस तरह कई लोगों का धर्म भ्रष्ट होने से बच गया। इसके बाद वह खेत में पहुंची तो उसका बच्चा उसे जिंदा मिला। इस तरह ग्वालिन हर वर्ष हरछठ को यह पूजा विधि-विधान से करने लगी।
जहां ग्वालिन ने बच्चे को रखा था वहां एक किसान हल जोत रहा था। उसके बैल बच्चे को देखकर खेत की मेढ़ पर जा पहुंचे। हल की नोक बच्चे पर लगने से बच्चा मर गया।
किसान को यह देखकर बहुत दुख हुआ। ग्वालिन वापस लौटी तो उसने अपने बेटे को मरा हुआ पाया। उसे ध्यान आया कि उसने झूठ बेचकर कई लोगों का धर्म भ्रष्ट किया है इसलिए उसे यह परिणाम हुआ है।

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